Friday, August 21, 2015

कशिश जाने कैसी रोके है इसे बिखर जाने से

Alok Tripathi's photo.

तरन्नुम बिखरी है फ़िज़ाओं में फिर भी
फिसल रहे है जाने क्यों अल्फ़ाज़ होठों से


निगाहों को अश्कों से मोहब्बत सी होगई
नही फिसल रहे जाने क्यों अश्क आँखों से


चेहरा आईना न हुआ फ़िज़ाओं की रौनक का
कशिश जाने कैसी रोके है इसे बिखर जाने से


स्याह समुन्दर के किनारों पर उभरा अक्स कैसा
कुछ तो रोके है मेरी चीख को निकल जाने से


कुछ यूँ अंधरे है अपनी ही इबारत नही दिख रही
जाने कौन रोक लेता है कहीं भी भाग जाने से


हर बार उठ के खड़ा होता ही हूँ मेरा नाम आएगा
जाने मेरी अर्जियों को कौन उड़ा दिया बहाने से


डॉ अलोक त्रिपाठी (C) 2015

Friday, August 14, 2015

नागफनियों को तपती धुप में


मैंने अपने हाथों की लकीरों से बनाई है शबीह तेरी 
माझी में ऐसा खुबसूरत तस्स्ब्बुर नजर आये कहाँ से?

मुस्कुराते देखा है हमने नागफनियों को तपती धुप में 
पर गुलाबों के चमन में हम ये चलन लाये कहाँ से ?

माना की कोई बर्क सा अल्फाज़ नही है हिकायत में 
पर बिना तेरे अपनी तस्ब्बुर-ए-हयात सजाए कहा से ?

पा भी लें तुझे गर तेरी ही शर्तों पर ये तो कोई बात नही
खरीद के सजाई तस्वीर हम वो नूर लायें कहाँ से ?

कि मेरी उम्र से भी लम्बी है 'मेरी' व् 'उसकी' रंजिश 
मुसलसल सिलसिले के बाद फतह का जुनून लाये कहाँ से?

डॉ अलोक त्रिपाठी (१९९८)