Tuesday, August 24, 2010

mera such



तुम ही मेरे पलकों के सावन में हो 
तुम ही मेरे अल्को के चिंतन में हो 
तुम ही मेरे सांसो की पुरवईयों में में 
तुम ही तो जीवन के पछुआ बयारो में हो

तेरे सांसो से उठती है दिल के सागर में मौजे 
तुम ही तो जीवन के शाश्वत दर्शन में हो
तुम्हारे ओठो पे उगते ओस के गुलशन 
जीती हुई बूंदों के नश्वर जीवन में हो 

तुम ही तो अलौकिकता के बादल के घनश्याम हो 
तुम  ही तो समस्ती  के सृजित साधन में हो 
मानवता की मानवीय अभिवक्ति हो तुम 
तुम ही तो रचना के बचपन में हो 

प्रेम के वास्तविक समर्पण में हो 
माया की रचना के बचपन में हो 
तुम ही तो विचलन के कारण में हो 
तुम ही तो सरलता के भटकन में हो 

Monday, August 23, 2010

इंतजार ......................




हसते हुए छोड़े जा रहे है ऐ गीत हम तुम्हे 
लौट के हम अपनी चाहत का सबब मांगेगे 

हर नजर से बचाए रखना ऐ मेरे खुदा 
वर्ना हम तुमसे अपनी इबादत का असर मागेंगे 

खुश रहना अपनी शबीह मेरी निगाहों में देख कर
वरना हम फिजाओं से तरनुम की कशिश मागेंगे 

तुम्हारी सारी तन्हाई साथ लिए जा रहे हम अपने 
मायूस हुए तो इस शहर से होने का शबब मागेंगे 

तुम्हारे चेहरे की एक सिकन रुला देगी मुझे वहा
वर्ना हम खुद से अपनी दुआओं का असर मागेंगे 

मेरे आंसू तो मेरे वजूद का सच बन गए है 
वो लम्हे जो साथ गुजरे तन्हाई में हिसाब मागेंगे