Tuesday, September 24, 2019

ऐ जिंदगी एक बात बताओ

(C) डॉ अलोक त्रिपाठी २०१९ 


जिंदगी एक बात बताओ
जब कभी मुझसे मिलोगे
तो मुझसे शर्माओगे तो नहीं ?
माना मेरा कोई कोई वजूद नहीं तेरे आगे
लेकिन ये अंतर् राम व् सबरी से जयेदे तो नहीं ?

जिंदगी एक बात बताओ


मेरे हिसाब किताब का लेखा दे दो
मेरे सरे गुनाहों का नाम दे दो
शर्माओं, हिचकिचाओ
तुम तो सबसे अपने हो मेरे.
तुमसे जयदे तो किसी ने नहीं देखा


जिंदगी एक बात बताओ

सच बताओ मुस्कुराओ मुँह छुपाओ
बस बोल दो सारे राज खो भी दो
तुमने सबसे जयेदे देखा है मुझे
मेरे सारे कर्मो के सबसे बड़ी गवाह हो
सच बताओ

जिंदगी एक बात बताओ

सच बताओ सही से तो देखा है मेरा हिसाब
मेरे आंसूं मुझसे कह रहे है
की तुमसे कोई गलती हुई है
जाने क्यों मेरा दिल कहता है कि तुमसे गलती हुई है
तुमने कुछ बेवफाई की है

जिंदगी एक बात बताओ

देखो मेरा सच कोई बहुत बड़ा तो नहीं
कल मै रहूँ रहूँ
पर ये सवाल तुमको परेशान करेंगे
लोग बार तुमसे पूछेंगे
किस जुर्म की सजा दी है मुझे

जिंदगी एक बात बताओ


सच सच बताओ 
मेरे हक़ से ज्यादा तो नहीं लिया मुझसे ?
जहाँ नहीं जीना था वहीं जीने को मजबूर तो नहीं किया मुझे
सच  बताओ  मुझे
अब मै भी तक रहा हूँ,
और हा ये तुम नहीं बताओगे मुझे


  जिंदगी एक बात बताओ

ये सिर्फ मेरा ही सवाल नहीं है
मेरे जैसे लाखों तुमसे ये ही पूछेंगे
हर बात पर ऊँगली उठाएंगे
किस किस से मुँह छुपाओगे
मुझे बहुत दर्द होगा तुम्हारे वेवफाई पर

मेरे सवालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है

शायद मेरे गुनाहों से भी ज्यादे
पर मासूम बन कर पूछता हूँ
क्युकी तुम ही तो सबसे सगे हो
तुम ही बताओ इन सवालों को लेकर कहाँ जाऊ ?
किसके दर पर सर पटकूं
और कहाँ  गिड़गिड़ाऊ ?

 जिंदगी एक बात बताओ


जिंदगी एक बात बताओ

मेरी फड़कती आँखों ने डराया है मुझे
खुजलाते हाथों ने डराया है मुझे
जब से होश सम्हाला है
तब से तुम्हारे नाम से डरा हूँ
अब जब हम मिले है तो सच बताओं

जिंदगी एक बात बताओ


(C) डॉ अलोक त्रिपाठी २०१९ 

Tuesday, September 17, 2019

शब् हुई तो ग़ज़ल मुकम्मल हुई

https://newheavenonearth.files.wordpress.com/2011/11
/hand-in-hand-with-the-sun.jpg



तुम मिले थे एक मिसरा बन कर 
शब् हुई तो ग़ज़ल मुकम्मल हुई 
सुबह चुनता रहा ख्याब रात भर के 
जाने कब मोहब्बत मुसलसल हुई 

तुम बिन भी तो जिए जा रहे थे हम 
जब तुम आये तो जिंदगी असल हुई 
उम्र दीवार पर टंगे तारीखों सी फटती 
तुम आये बस ख्वाबो की फसल हुई 

वेखौफ्फ़, बनजारा बन भटकता रहा
तुमसे मिला तो जैसे खुद से वस्ल हुई 
तेरे लिए भी तुझसे जुदा हो जाऊ मै 
अबतक न उल्फत में ऐसी अज़ाल हुई 

(C) २०१९ डॉ अलोक त्रिपाठी 

Sunday, September 15, 2019

ऐ प्रेम, तुम बस अव्यक्त रहो,


प्रेम, तुम बस अव्यक्त रहो,
अन्नन्त रहो, अशेष रहो।
बिन आधार के प्रवाह बनो,
बिन ध्यान के अराध्य रहो।

चेतन होकर भी अवचेतन बन
सृष्टि में तुम शाश्वत प्रवाह रहो
आसक्ति, अनासक्ति से सूदूर,
अविरल अनन्य, पर निर्भाव रहो।

सासों सदृश जीवन बन जियो
तुम होने की बस अनुभूति रहो
परीक्षा परिणाम कोसों दूर
वायु सा सरल, समीकरण रहो

बिन साधन, साध्य की साध बनो
अविकल, निश्छल, निर्विघ्न बहो,
हे प्रेम! तुम स्वयं में समष्टि बनो,
समरस सनातन सर्वत्र रहो

(c) डॉ अलोक त्रिपाठी, २०१९

Saturday, September 14, 2019

फिर सावन में भादो बरसेगा

आज फिर से घटायें छाई है
फिर सावन में भादो बरसेगा
संध्यावेला में पूर्वाह्न के स्वपन
आज फिर अपना ऋण मांगेंगे

माना प्रेम अमूल्य है, फिर भी
आशक्ति का मूल्य तो होता है
विधाता का प्रेम अकारण सही
जीवन प्रवाह तो धरातल मांगेगा

प्रेम, आशक्ति में भेद आवश्यक
लौकिकता को लौकिक रहने दो
कोई तो नहीं दिखा पाया उसे
वो जिसे चाहे उसे ही  बाटेगा

(C) डॉ अलोक त्रिपाठी २०१९

सारे शब्दों को जला दोगे,

http://aprendizdeafrodite.blogspot.com/2015/01/
feitico-para-reunir-casal-separado.html
वो कहता है कि चले जाओ मेरी जिंदगी से
मै जी लूंगा तुम्हारे बिन भी, यकीं भी कर लिया
जिसमे एक पल के लिए भी हम अलग थे
भुला दोगे वो लम्हे भी हमेशा के लिए ?

गुजारी हमने एक एक पल जो सदियां थी
सपने जो कभी जिए थे हम साथ साथ
जिसकी कड़ियाँ जोड़ी थी हमने मिलकर
इतने ताकतवर हो गए कि सब तोड़ लोगे?

चलो माना कि  तुम सारी यादें मिटा दोगे
 प्यार के सारे धागे, सारे सामान जला दोगे,
सारे शब्दों को जला दोगे, मेरा दर्द जला दोगे,
लेकिन तेरे बिन, पर पल पल मरती हुई आहें?


डॉ आलोक त्रिपाठी (C) 2019





Saturday, May 11, 2019

हर हमसफर मंजिल नही होता


जब कभी मै उसकी तलाश था ही नही 
फिर खुद को तराशने से क्या फायदा?

वो हर पल किसी और को ढूढ़ता रहा 
मै बस खुद को ही और सवारता रहा 

हर हमसफर मंजिल नही होता इश्क में 
जान ही नही पाया, बस मासूम बना रहा 

जब ये सच समझा तब बहुत देर हो गयी
उसकी तलाश में मै एक हमराह बना रहा 

अप्रैल १२, २०१९ अलोक त्रिपाठी 



Thursday, May 9, 2019

ये बताओ न प्रिये, क्या मांगूगा उस वक्त


ये बताओ न प्रिये, क्या मांगूगा उस वक्त
जब ज़िन्दगी से मै आखिरी बार मिलूगां?

तुम्हें चाहने की ख्वाईस, या तुम्हारी चाहत?
चाहत को मै अपने शब्दों में कैसे समेटूगा?

या तस्वीर सी उभरेगी चाहत के फलक पर?
पर उस तस्वीर में सारे रंग कैसे भर पाऊगा?

उसी से हर सांस में चाहने की चाहत मांगी है
फिर तुमको खुदा अपना कैसे मान पाऊगा?

क्या फर्क पड़ा, जो तुम्हारी चाहत कम रही ?
न हो पाऊगा बेशर्म, बस उसी को मांग पाऊगा

हां मेरी सारी दुआ तेरी खुशीयों के सदके सही
फिर भी तुमको चाहू, ये दुआ न मांग पाऊगा

डा आलोक त्रिपाठी २९ अप्रैल २०१९