Friday, December 23, 2016

आँसू: काफियों मे काटी है

आँसू: काफियों मे काटी है: वो गजल आज तक मुकाम्मल न हुई  उम्र ज़िसके लिये काफियों मे काटी है वजूद के इतने चेहरे नजर आये मुझे  जाने कितने सवालों मे ये ज़िन्द...

काफियों मे काटी है


वो गजल आज तक मुकाम्मल न हुई 
उम्र ज़िसके लिये काफियों मे काटी है

वजूद के इतने चेहरे नजर आये मुझे 
जाने कितने सवालों मे ये ज़िन्दगी बाटी है

हर मंझर पर ठहरता है दिल कि मंजिल है 
शक्ल जाने कितनी तस्वीरों मे ऊतारी है

ज़रा समहल के रखो इस आईने को य़ारों 
बडी मुश्किल से उनकी तस्वीर इसमे ऊतारी है

हमेशा से रूठे रहे ज़िन्दगी के माएने मुझसे 
चन्द उसूलों के बुते हमने ज़िन्दगी गुजारी है

हालात मुझे खामोशी पर मजबुर करते है यारो 
उम्मीदो ने ज़िन्दगी को हज़ार टुकडों मे बाटी है

-- © डॉ आलोक त्रिपाठी (२०१६)

Monday, August 22, 2016

.................फिर भी ज़िक्र करने का जी नहीं


ज़िन्दगी मे इसी मंझर का मुझे इंतजार अर्से से था शायद
हजारो तुफान ज़िहन मे फिर भी ज़िक्र करने का जी नहीं

ये शायद इसलिये भी हैं कि हर अक्स पर धुंध ही छाई हैं
इस शोरगुल मे भी खुद के सन्नाटे से निकलने का जी नहीं

कुछ काशिस तो हैं जो इस ज़िन्दगी से अब भी जोडे हैं मुझे
वर्ना इस सफर मे ख्वाबो की तपिस मे जलने का जी नहीं

कितना आसां या कितना मुशकिल हैं फर्ज मानकर जी लेना
एक वादे के लिये अब खुद को मार कर जीने का जी नहीं

देखिये तो ये कैसी मुगालते हैं नासीब की मेरे सुलझी ही नहीं

हाकिकते शर्मिन्दा हुई ख्वाबो से जब भी जीने का जी नहीं


© डॉ अलोक त्रिपाठी, २०१६  


Thursday, March 17, 2016

मेरी आरजुएं है वेवफा....


मुझे मंजिलों की  जुस्तजू मेरी हसरतें है वेवफा
सरे राह मेरा हमसफर, रहा ठोकरों का काफिला 

ये थकन नही रास्तों कि था मेरी तपिस का बसबा 
हरकुछ समेटा रहा सफर में, समझके  मेरा हमनवां 

जिद न थी पाने कुछ कि चल रहा जो एक जूनून था 
गुमां रहा कि सफर में हूँ एक अक्स का था बसआसरा 

नाज़ था सफर पे अपने, यकीन था अपनी बजुवों पे 
खौफ न रहा मंजिलों का सफर में था यूँ इब्तिदा

सफरे अब्र है मेरी पेशानी पे, हर हर्फ है एक गजल

ज्यादे  की दरकार क्या, हर दर्द था एक बायबा

जब ठोकरों से ही बन रहे कहानियों के है सिलसिले 
हो क्यूँ जुस्तजू मुझे मंजिलों, जब ठोकरों में है सिलसिला 


-----(C) डॉ अलोक त्रिपाठी २०१६ 

IMAGE FROM 
https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcS1qAau1SBDxpddMs4jEpycHR332QITU5K_nQWqaYgjEpCjUAm4

Thursday, October 15, 2015

उन तमाम खवाइसो को क्या नाम दू?



कभी सोचता उन तमाम खवाइसो को क्या नाम दू?
जो जली तो जी भर के पर कभी दिखी ही नही

दिल में ही सुलगती रही जी भरके भठ्ठी की तरह
पर कभी भी किन्ही अल्फाजो में दर्ज नही हुई

यक़ीनन ‘अल्फाजो से बेरुखी’ शहादत का चेहरा रहा
कभी वक्त, कभी हालत के जंजीरों को तोड़ नही पाई

दफन होगयी माझी का एक खुबसूरत ख्याल बनकर
वक्त के किसी कोनेमें, हाल के साथ, सिसकती रही

सिसकियाँ जो आंसूं नही बन पायी तैरती रही पलको पर
नाव तैर रही हो समन्दरमें कोई जिसकी मंजिल ही नही

डॉ आलोक त्रिपाठी (c) २०१५ 

Saturday, October 10, 2015

चंद लब्ज़ों में कैसे कह दूं .....


चंद लब्ज़ों में कैसे कह दूं मै तुमसे क्या चहता हूँ? 
चाहता हूँ कि तुम्हे कहीं बहुत दूर ले जाऊं 
ज़माने की निगाहों से तुमको छुपा के 
तुम्हारे ख्वाबो के अस्मा के तले 
तुम्हारी ख़्वाइसों के घनेरे बादलों की जमी पर 
जहाँ तुम जी भर के जी सको एक पल में सारी जिंदगी
खुश हो सको जितना पहले कभी न हुए हो 
लेकिन मै कहीं भी तुम्हारे करीब न रहूँ 
पर हमेशा तुम मेरे निगाहों में रहो 
क्योंकि मै तुम पर भी भरोसा नही करता तुम्हारे लिये
तुम्हारे लिए .....ये क्या कोई कैद होगी ?
नही जनता कब तक मै खुश रख सकता हूँ?
लेकिन जब भी मेरी ख्वाइसे तुम्हे जंजीर लगे
तुम मुझे बोल के कहीं भी चले जाना 
पर तुम नही देख पाओगे कभी भी पिछली कहानी 
मै तुम्हे कहीं, भी पीछे नही मिलूँगा इसलिए खोजना भी नही
फिर आगे का सफर सिर्फ तुम्हारा होगा 
जिसमे तुम्हारी चुनी रहों पर तुम्हारी मंज़िल होगी 
बिना किसी माझी के, फकत हाल के सहारे मुस्तकबिल् तक 
चन्द सफ़ेद बिखरे पन्नें होगे बिना किसी इबारत या अक्स के 
उनमे तुम कोई भी रंग भर सकते हो अपनी पसंद का 
जैसा भी चाहो फिर पूरा कैनवास तुम्हारा ही तो है


-----डॉ अलोक त्रिपाठी २०१५ 

Friday, September 11, 2015

मुझे जीने ही नही आता


मुझे जीने ही नही आता ये कह 
मुझे हर बार जगाती रही माँ .
आज के बाद फिर कभी नही भूलूंगा
ये कह के खुद को सुलता रहा माँ 

आज की रात आँखों की आखिरी बरसात है, 
रातों के पंछी ये गीत गुनगुनाते गये 
सुबह की लालिमा कही आँखों को सुर्ख न कर 
ये कहते कहते पलक मेरे बुझते गये 

हर रात बुने चंद अल्फाज़ हमने 
अगली तारीख में वो ही मेरी तक़दीर होगये 
अगले पल ही कौन सा तूफा आएगा 
ये ही सवाल मेरे जेहन में एक तूफान हो गये 

डॉ अलोक त्रिपाठी (१९९०)
(यह मैंने बहुत छोटे पर ही लिखी थी जाने आज क्यूँ याद आगयी )