Wednesday, September 5, 2012

चल चाँद तुझे ले चले



चल चाँद तुझे ले चले अपने गोरी के गाँव रे 
तू  वहां  उसे बतलाना  कैसे गुजारी शाम रे 

चाहत  वहां पर  यूँ बरसे जैसे बरसे सावन रे 
मेरी आखें मुझसे पुछें  कब भीगे तेरा दामन रे 

हर दिन वहां का होली था हर रात दिवाली रे 
सुना रहा मेरा  तन -मन सुनी रात हमारी रे 

नागफनी सा बचपन चिड सा यौवन  ना वो याद पुरानी रे 
मुड़ना चाहूँ  तो क्या देखूं आगे वही  रेत पुरानी रे 

राहें वहां की उची-नीची बेरहम वहां के कांटे रे 
बूंद बूंद कर पीता रहा अपनी ही आँख का पानी रे 


©आलोक त्रिपाठी  1999 

Saturday, September 1, 2012

और ये ही है मेरा सच






आज जो मेरे पास है, जब सिर्फ वो ही है मेरा हक  
वो ही मेरे माज़ी के पौधे पे लगा फल, 
तो फिर मै जो कर रहा हूँ वो ही है मेरा सच
जब उसकी मर्जी के बिना पत्ता नही हिलता 
जब मै "कर्ता" हूँ ही नही या कुछ कर ही नही सकता 
तो फिर ये हंगामा ही क्यूँ , ये धुंध किस बात की 
फिर मैंने भी वो ही किया जो मै कर सकता था !
और ये ही है  मेरा सच 
मै अपना सच परिभाषित का हक तुम्हे नही देसकता 
क्यूंकि तुम भी तो नही जानते मुझे पूरी तरह से 
मेरे सारे दर्द मेरी सारी तकलीफें, मजबूरियाँ 
मै कहाँ से क्यूँ मुड गया और कहाँ चला आया 
ये सिर्फ व सिर्फ मै जनता हूँ  या फिर "वो" 
फिर तुम कैसे निर्धारित कर सकते हो 
मै कहाँ कैसे और क्या गलत कर दिया !!
नही ये तुम्हारा पाप है इसीसे बचो 

© आलोक त्रिपाठी, 1988