Tuesday, March 10, 2015

........जो इस पल तुम्हारे साथ हूँ


मै तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की तरह तुम्हारी मुश्किलें भी सुलझा लूंगा 
बस इन आँधियों के बीच मेरे हुनर का इम्तिहान न लो। 

मै तुम्हारी बेरुखी को भी तुम्हारी हक़ीक़त मान लूंगा 
बस ज़रा इस तूफानों में मेरे वफाओं का इम्तिहान न लो 

साहिल पे पहुचने तक मै हमसफ़र हूँ फिर ये सफर तुम्हारा 
यूँ बीच में हाथ छुड़ा कर मेरी ताबेदारी का इम्तिहान न लो 

मेरे फैसले पर न यकीन करो पर हवाओं का रुख तो समझो 
बीच दरिया में कूद कर उसकी रहमत का इम्तिहान न लो 

मै तो उसके क़ासिद के मानिंद हूँ जो इस पल तुम्हारे साथ हूँ 
मुझे इस तरह नज़रों से गिरा उसके सब्र का इम्तिहान न लो 

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© डॉ आलोक त्रिपाठी २०१५

Monday, March 9, 2015

..............दबे पैरों से आते हुए देखा है?

तूफां  को कभी तुमने सरगोशी से दबे पैरों से आते हुए देखा है?
मासूम कदमो को तन्हाइयों के तार बजाते हुए देखा है?

बीती किरदारों की उलझे शक्लों में अपनेपन की गवाही
तजुर्वों को छुए बिन नन्हे ख़्वाबों को पलको में आते हुए देखा है?

रिसते हुए जज्बातों से पिघलती मेरे वसूलों की दीवारें
सिमटने की कोशिश में, मौन लब्जों को उबलते हुए देखा है?

हौले -२ मेरी गहरी जड़ों को में समाती हुई उलझी ख्वाईसे
पल पल कमजोर बनकर रौशनी को बुझते हुए देखा है?

इसने ही बताया है आँक से अक़ीक़ को शिकस्त देने की अदा
कभी मासूम फूलों से संगदिल सनम को मुस्कुराते हुए देखा है ?

किनारे के दरकने में मिटटी की नसों में  रिसता हुआ पानी 
खुद में समा लेने के लिए अरमानों को सुलगते हुए देखा है ?

© डॉ आलोक त्रिपाठी २०१५