Saturday, May 11, 2019

हर हमसफर मंजिल नही होता


जब कभी मै उसकी तलाश था ही नही 
फिर खुद को तराशने से क्या फायदा?

वो हर पल किसी और को ढूढ़ता रहा 
मै बस खुद को ही और सवारता रहा 

हर हमसफर मंजिल नही होता इश्क में 
जान ही नही पाया, बस मासूम बना रहा 

जब ये सच समझा तब बहुत देर हो गयी
उसकी तलाश में मै एक हमराह बना रहा 

अप्रैल १२, २०१९ अलोक त्रिपाठी 



Thursday, May 9, 2019

ये बताओ न प्रिये, क्या मांगूगा उस वक्त


ये बताओ न प्रिये, क्या मांगूगा उस वक्त
जब ज़िन्दगी से मै आखिरी बार मिलूगां?

तुम्हें चाहने की ख्वाईस, या तुम्हारी चाहत?
चाहत को मै अपने शब्दों में कैसे समेटूगा?

या तस्वीर सी उभरेगी चाहत के फलक पर?
पर उस तस्वीर में सारे रंग कैसे भर पाऊगा?

उसी से हर सांस में चाहने की चाहत मांगी है
फिर तुमको खुदा अपना कैसे मान पाऊगा?

क्या फर्क पड़ा, जो तुम्हारी चाहत कम रही ?
न हो पाऊगा बेशर्म, बस उसी को मांग पाऊगा

हां मेरी सारी दुआ तेरी खुशीयों के सदके सही
फिर भी तुमको चाहू, ये दुआ न मांग पाऊगा

डा आलोक त्रिपाठी २९ अप्रैल २०१९

Sunday, April 28, 2019

आँसू: दिल को कईयों में तक्सीम करने का मौसम आया

आँसू: दिल को कईयों में तक्सीम करने का मौसम आया: चाहत को जब से किश्तों में निभाने का चलन आया  यकीनन मोहब्बत से तौबा करने का मौसम आया  जमाना घुटन महसूस करने लगा किसी एक के साथ में  ...

दिल को कईयों में तक्सीम करने का मौसम आया



चाहत को जब से किश्तों में निभाने का चलन आया 
यकीनन मोहब्बत से तौबा करने का मौसम आया 

जमाना घुटन महसूस करने लगा किसी एक के साथ में 
गजब की दुनिया ये, बरसात में प्यासे मरने का मौसम आया 

हम तो किसी एक की चाहत में फना होना ही समझ आया 
पर उसने चाहत को कई चेहरे में बाटने का मन बनया है  

फिर कभी तफ्सील से लिखूंगा फायदे नुकसान का हिसाब
 फ़िलहाल तो उनकी शर्तों में सर झुकाने का मौसम आया

सारी मुश्किलें तो सुलझा लिए फ़क्त एक सवाल के सिवाय 
एक दिल को कईयों के बीच तक्सीम करने का मौसम आया 

डॉ आलोक त्रिपाठी २०१९