Monday, May 14, 2018

ऐ आजनवी....


मेरे आंसूँ को अपने आँखों का सैलाब बना लेते हो
ऐ आजनवी मेरी खुशियों मे एक ज़िन्दगी जी लेते हो
तुमसे कोई रिश्ता जोडने की गुस्ताखी न्ही कर सकता
गैर बन कर ही तुम मेरी सारी दुनिया सजा लेते हो

एक मासूम ने एक मजलूम को खुदा बना पूजा है
अपनी हर ख़ुशी उसने किसी पे यूँ ही कुर्बां कर दी
खुद को यूँ भूलाय़ा है जैसे जीने के लिए आया ही न्ही
कैसे किसी की ईबादत मे इक ईबादत बन जी लेते हो

तुमने ही चिरागों को सिखाया है जल कर रौशन करना
किसी की रहनुमाई मे खुद को चिराग बनाने का हुनर
कभी खुद की तकलीफों से दोचार हुएे बिना ज़िन्दा रहे
कैसे यूँ गैरों के लिए कोई पल पल घुट घुट कर जी लेते हो

खुदा ने तुमको कुछ बहुत खास सा दिल अता फर्माया होगा
खुद के लिए मरने वालों की भीड मे फरिश्ता बनाया होगा
वरना इंसानो ने कब से इंसानो के ज़ख्म पर दवा लगाया है
फकत इंसान नही हो जो दुसरे के हिस्से का जहर पी लेते हो

.... © डा अलोक एस एन त्रिपाठी २०१८ 

...बिना रिश्ते के एक नाम दे जाऊँगा

जाने के बाद कुछ आँखो में नमी छोड जाऊँगा
मैं अपने किरदार में कुछ एहसास जोड जाऊँगा

चाहे कोई याद करे ना करे अपनी उम्र तक मुझको
य़ादों का मखमली मासूम सिलसिला छोड जाऊँगा

रंज होगा उन्हे भी जो छोड गए अपने ख्वाबो के लिए
जीते जी अपनी आवारगी का वो एहसास छोड जाऊँगा

मुझे भी वो याद रखे अपनी दुवाओं में कभी ना कभी
य़ादों का अपनी वो मुसलसल सिलसिला छोड जाऊँगा

नहीं जाया नहीं होंगी चाहते किसी एक शक्स के लिए
अब मैं चाहतों को, बिना रिश्ते के एक नाम दे जाऊँगा

....  © डॉ अलोक त्रिपाठी 2018

कुछ टूटे हुए कांच


तुम्हारा हुसन एक गज़ल एक ख्वाब है मेरे हायात का
तुमसे मिला तो मुझे लगा, जैसे मैं ज़िंदा हूँ तुम्हारे लिए


अलोक


तुम्हारी हर ह्रफे वफा पर कायम है ये साये जहां मेरा
ये कैसे कहुं कि एक तेरी बेरुखी से दारक्ता है ये साया

अलोक

पैमाने मे भी ज़िन्दगी के कई रंग छलकते, 
कभी गज़ल कभी मिसरा बन टपकते है
दो घुंट मे जब उनकी य़ादों मंजर जवां हो 
तो आँखो मे शाम के स्याह साये उभरते है

अलोक

दर्द हैं दिल में पर इसका ऐहसास नहीं होता,
रोता हैं दिल जब वो पास नहीं होता,
बरबाद हो गए हम उनकी मोहब्बत में,
और वो कहते हैं कि इस तरह प्यार नहीं होता

अलोक 


दिल की अदालत ने उसे कभी मुजरिम नही कुबूला
उसके  हर गुनाह की तर्के ए वफ़ा हम रखते है


अलोक

मुस्कुराना इतना मुश्किल भी होगा कभी सोचा भी न था
ज़ितना कभी अदा न कर पाऊँ वो कीमत चेहरा मांगता है

अलोक 


मेरी शामो-सुबह गिरवी है मेरे हसरतों के दर पर
मुझे कुछ वकत ख्वाइसों को मुझसे जुदा रहने दे



अलोक 

मैं वो ख्वाब नही ज़िसे सजा ले कोई अपनी पलको पे 
चन्द बिखरे पन्नो में सिमटी ये हिकायत है मेरी

अलोक 

राहों में उन्ही पत्थरों पर सर पटकना पडा 
जिनको मेरे दर्द का कोई इल्म ही ना था

अलोक 

कुछ तो दर्द पिघले और मैं कुछ लिखूँ
ज़मा हुआ दर्द सीने में ही सूख रहा है

अलोक 



मैं तो बस खुद की ही य़ादो में बिखरता गया
कहाँ किसी ने अपनी चाहत का इजहार किया
मैं ही पत्थर को खुदा बनाने जिद्द पर अडा रहा
बिखरना तो अंजाम था, य़ादो का काफिला भी गया

अलोक 


रात भर का सफ़र है 
और बेचारा चाँद तनहा 
बस एक ग़ज़ल का साथ 
गुजर जाये ये उम्र तन्हा

अलोक