Monday, August 5, 2013

मै जीता हूँ कि उसे फिर से पलकों में उतार लूं

एक सुप्त सागर की गोद से एक मोती निकला 
ये समझा ये माना अभी तक किसी ने नही देखा 
अपने ही रक्त से रक्ताभ लालिमा दी उसे 
जब आच्छा नही लगा तो आसुओं से धो दिया 
मेरा शक जाने कब विश्वास में बदल गया 
और मेरे तर्कों की कोई भूमिका नही मिली 
पहले तो ये जाना की को चमकता नूर मोती है 
जब वो सच से मुखातिब हुआ तो नजर से ढल गया 
गम इसका नही कि वो मेरी नजर से बुझ गया 
गम अपनी कसक की कीमत या फितरत का भी नही 
गम बस ये की आँख का वो मोती आखों से ढल गया 
फिर जाने कहाँ गया और बस चला ही गया 
गम ये रहा कि  आँख का नूर पैरों में न गिरे 
ये जहाँ उसे कभी झुकी नजरों से न देखे 
बस इसी स्वप्न की तहरीर में लिखता हूँ 
मै जीता हूँ कि  उसे फिर से पलकों में उतार लूं 

-© डॉ आलोक त्रिपाठी १९९८ 

3 comments:

  1. आप ने लिखा... हमने पढ़ा... और भी पढ़ें... इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना शुकरवार यानी 09-08-2013 की http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस हलचल में शामिल रचनाओं पर भी अपनी टिप्पणी दें...
    और आप के अनुमोल सुझावों का स्वागत है...




    कुलदीप ठाकुर [मन का मंथन]

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  2. सुन्दर रचना

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