Thursday, March 7, 2013

अदब से




मुझे गिला 'दर्द' के होने से नही, बस उसके छलक जाने से है
ये जहाँ क्या जान पाता मेरे हर पल की मुस्कराहट का सबब

उम्र के इस मोड पे जरा जरा सा होश आने लगा है मुझको,
किताबों  की इबारत में समझने लगा हूँ जमाने का अदब

अभी भी सीख लूं ज़माने के चलन, कि कई इम्तिहान बाकी है
जाने क्यूँ दिल से खौफों का सिलसिला  जाता नही है अब

शब् गुजरती है खुद से गुप्तगू में, कि सहर दे देता बिखरे ख्वाब
ये चेहरा जाने कैसे कर देता है चुगली कि समझ जाते है सब

कभी भी नही लगा कि चाहिए मुझे ये सारा जहाँ जीने के लिए
फिर ये साजिस किसकी है जो ला दिया मुझे इस मोड पर अब

जो छोड़ आये थे गैर जरुरी मान के, एक अरसे पहले कहीं
क्यूँ आरजुवों में शामिल होने लगा है और बन गया है वो रब


© डॉ आलोक त्रिपाठी 2013

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