Tuesday, March 10, 2015

........जो इस पल तुम्हारे साथ हूँ


मै तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की तरह तुम्हारी मुश्किलें भी सुलझा लूंगा 
बस इन आँधियों के बीच मेरे हुनर का इम्तिहान न लो। 

मै तुम्हारी बेरुखी को भी तुम्हारी हक़ीक़त मान लूंगा 
बस ज़रा इस तूफानों में मेरे वफाओं का इम्तिहान न लो 

साहिल पे पहुचने तक मै हमसफ़र हूँ फिर ये सफर तुम्हारा 
यूँ बीच में हाथ छुड़ा कर मेरी ताबेदारी का इम्तिहान न लो 

मेरे फैसले पर न यकीन करो पर हवाओं का रुख तो समझो 
बीच दरिया में कूद कर उसकी रहमत का इम्तिहान न लो 

मै तो उसके क़ासिद के मानिंद हूँ जो इस पल तुम्हारे साथ हूँ 
मुझे इस तरह नज़रों से गिरा उसके सब्र का इम्तिहान न लो 

…………
© डॉ आलोक त्रिपाठी २०१५

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