Tuesday, May 30, 2017

इश्क का बजार लाया हूँ


हमेशा रोया बहुत इन नज़रों की बेबसी पर अपने
फिरभी अंधों के शहर में आईना बेचने लाया हूँ

पूरी शिद्दत से जानता अपने इस कारोबार के फायदे
नाउम्मीदी में ही सही काफिरों को खुदा बाटने आया हूँ

तुम हँसते हो या रोते, मेरी अक्ल पर तुम्हारी रजा है
खुश हूँ की जो करने आया था वही करने आया हूँ

ये हालात की मुफ्लिशी भी मंजूर है मुझे कि मेरी है
मुझे दुनिया साथ नही ले जानी बस खाली कंधे लाया हूँ

एक फरेब है कि इन्सान जिन्दा है वरना खुदा क्यू आता?
वो तो मै हूँ जो नफरतों के शहर में इश्क का बजार लाया हूँ

(C) आलोक त्रिपाठी २०१७ 

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