Monday, May 14, 2018

ऐ आजनवी....


मेरे आंसूँ को अपने आँखों का सैलाब बना लेते हो
ऐ आजनवी मेरी खुशियों मे एक ज़िन्दगी जी लेते हो
तुमसे कोई रिश्ता जोडने की गुस्ताखी न्ही कर सकता
गैर बन कर ही तुम मेरी सारी दुनिया सजा लेते हो

एक मासूम ने एक मजलूम को खुदा बना पूजा है
अपनी हर ख़ुशी उसने किसी पे यूँ ही कुर्बां कर दी
खुद को यूँ भूलाय़ा है जैसे जीने के लिए आया ही न्ही
कैसे किसी की ईबादत मे इक ईबादत बन जी लेते हो

तुमने ही चिरागों को सिखाया है जल कर रौशन करना
किसी की रहनुमाई मे खुद को चिराग बनाने का हुनर
कभी खुद की तकलीफों से दोचार हुएे बिना ज़िन्दा रहे
कैसे यूँ गैरों के लिए कोई पल पल घुट घुट कर जी लेते हो

खुदा ने तुमको कुछ बहुत खास सा दिल अता फर्माया होगा
खुद के लिए मरने वालों की भीड मे फरिश्ता बनाया होगा
वरना इंसानो ने कब से इंसानो के ज़ख्म पर दवा लगाया है
फकत इंसान नही हो जो दुसरे के हिस्से का जहर पी लेते हो

.... © डा अलोक एस एन त्रिपाठी २०१८ 

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