आज फिर से घटायें छाई है
फिर सावन में भादो बरसेगा
संध्यावेला में पूर्वाह्न के स्वपन
आज फिर अपना ऋण मांगेंगे
माना प्रेम अमूल्य है, फिर भी
आशक्ति का मूल्य तो होता है
विधाता का प्रेम अकारण सही
जीवन प्रवाह तो धरातल मांगेगा
प्रेम, आशक्ति में भेद आवश्यक
लौकिकता को लौकिक रहने दो
कोई तो नहीं दिखा पाया उसे
वो जिसे चाहे उसे ही बाटेगा
(C) डॉ अलोक त्रिपाठी २०१९
फिर सावन में भादो बरसेगा
संध्यावेला में पूर्वाह्न के स्वपन
आज फिर अपना ऋण मांगेंगे
माना प्रेम अमूल्य है, फिर भी
आशक्ति का मूल्य तो होता है
विधाता का प्रेम अकारण सही
जीवन प्रवाह तो धरातल मांगेगा
प्रेम, आशक्ति में भेद आवश्यक
लौकिकता को लौकिक रहने दो
कोई तो नहीं दिखा पाया उसे
वो जिसे चाहे उसे ही बाटेगा
(C) डॉ अलोक त्रिपाठी २०१९
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