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Friday, July 10, 2015

बड़ा अजीब सा मंझर है ये मेरी जिन्दगी की उलझन का


बड़ा अजीब सा मंझर है ये मेरी जिन्दगी की उलझन का 
गहरी ख़ामोशी में डूबा हुआ है सजर ये मेरे अपनों का 

सिले होठों के भीतर तूफानों की सरसराहट से टूटते सब्र 
लगता है जहर बो दिया हो किसीने अपने अरमानों का 

आवाजों को निगलते मेरी बातों के अंजाम का खौफ 
खुली हवाओं में घुला हो जहर तहजीब व् सलीकों का 

जीने का हुनर सीखते २ रूठ गयी है जिन्दगी मुझसे 
शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ मै घुटन जंजीरों का 

आपनो से इतनी नफरत कि बस भाग जाऊकही 
शिकायत किसी से नही बोझ हैं चाहत के अपनों का 

...........डॉ आलोक त्रिपाठी (२०१५) 

Sunday, June 21, 2015

प्रेम या आशक्ति

प्रेम शब्द का सन्धि विग्रह यूँ होता है
प्रेम=परा +ई +म। अर्थात जो शक्ति हमे उर्ध्व की ओर ले जाये वो 'प्रेम' है। आजकल की प्रचलित भाषा में हम जिसे प्रेम कहते है वो वास्तव में आशक्ति का ही एक स्वरूप है. जिसके तीन भेद होते है. 
वासना - क्षणिक एवं तीव्र आवेगित होती है
कामना - सामान गुणों के कारण उत्त्पन्न आशक्ति
एवं श्रद्धा-स्वयं से श्रेष्ठ होने के कारण उत्त्पन्न आशक्ति
सनातन धर्म में होने वाले विवाह में इन तीनो आशक्ति से होते हुए अन्तः मोक्ष को प्राप्त हुआ जा सकता है। विवाह के तुरंत बाद ही भोग की इच्क्षा से वासना उत्पन्न होती है जो साथ २ रहते २ कामना में बदलती जाती है। और अन्तः कामना इतना ज्यादे होजाती है कि श्रद्धा का स्वरुप ले लेती है

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आँसू: अब तो सपनों के भी भावार्थ बदल गए

आँसू: अब तो सपनों के भी भावार्थ बदल गए: एक अरसे से खुद को समझाता आ रहा हूँ  धीर धरो एक बार शकु से बैठ कर बात करेंगे गुजरे वक़्त का सलीके से हिसाब करेंगे  सबका हक हिस्...

अब तो सपनों के भी भावार्थ बदल गए



एक अरसे से खुद को समझाता आ रहा हूँ 
धीर धरो एक बार शकु से बैठ कर बात करेंगे

गुजरे वक़्त का सलीके से हिसाब करेंगे 
सबका हक हिस्सा उसके नाम करेंगे

साल दर साल गुजर गए, एहसास बदल गए 
अब तो सपनों के भी भावार्थ बदल गए

पर आज तक वो वक़्त नही आया 
अब तक खुद के इतने करीब नही आया।

--------------- आलोक त्रिपाठी

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Thursday, June 18, 2015

..........कि हम जहाँ से खो गये


न गीत साथ दे रहें न, ही ये शाम साथ दे रही 
शबनम से इतनी धुंध है नजर रौशनी को खो रही 

आगे अँधेरी डगर है ये सोच कर भी चल रहे 
कदम मेंरे है बढ़ रहे  साँस जो ये चल रही

इस बात की खबर नही सहर कहाँ  पे हो 
इस बात की कसक नही शाम छोड़ आये 

फलक कफन कर देना जो रात मेंही सो गये 
ये खबर उन्हें भी हो कि हम जहाँ से खो गये 

(बहुत पुरानी कुछ पंक्तियाँ याद आगयी)

(C) आलोक त्रिपाठी १९९० 

Sunday, April 19, 2015

आँसू: समेत लेते वो "सब" जो नहीं था हाथ की लकीरों में

आँसू: समेत लेते वो "सब" जो नहीं था हाथ की लकीरों में: अगर तोड़  लेते हम खुदाई से अपने रिश्ते सारे  समेत लेते वो "सब" जो नहीं था हाथ की लकीरों में  वो चाहते दम तोड़ गयी थीं तस्व्व...

समेत लेते वो "सब" जो नहीं था हाथ की लकीरों में

अगर तोड़  लेते हम खुदाई से अपने रिश्ते सारे 
समेत लेते वो "सब" जो नहीं था हाथ की लकीरों में 

वो चाहते दम तोड़ गयी थीं तस्व्वरो फकत जो 
होते वो भी मेरे आशना कर आये जिसे उसके हवाले 

बचा रखे है उसने तेरे सारे हक रहनुमा कहते है 
अदा कर देगा वो सब तेरी बेताब ख्वाइशों को 

क्या करू मै भी फकत एक इन्सान ही ठहरा 
क्यों न  बरसे सावन गमों के मुस्कुराने पे 

यूँ भी तो नहीं कि मुझे इतफाक नहीं उसके होने पे 
ये भी तो नहीं मालूम कैसे समझों इन सवालो में 

मज़बूरी यूँ कि उससे मुँह भी नही फेर सकता 
कैसे चलूँ आगे जो घिरा हूँ जो इन सवालों में 

© डॉ आलोक त्रिपाठी १९९२